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बुधवार, 31 मार्च 2010

केसे बताऊँ ऊंचाई उनको आसमा की,
हमने भी पर अभी ही खोले हुए हैं ,

क्यों जाऊ वहां उनका सुनने को में जलसा
हर एक लफ्ज पुछ कर वो बोले हुए हैं

को ई आ रहा है ये खबर उसको भी लग ग ई
तभी आज दरवाजा वो अपना खोले हुए है

हो रही हे उसकी शादी की बातचीत
अपना लिबास इसीलिए वो बदले हुये है

कमलेश दुबे

मेरे घर का धुआं हे

तुमको जो काले बादल वहां दिखाई देते हैं
है नहीं कुछ और मेरे घर का धुँआ हैं

उंगलियो को आंच लगती नहीं है आज
शायद नमी का लकड़ियों से कुछ समझोता हुआ हैं

हैं नहीं निशा किसी हादसे के ये
शराफत से जीने का यहाँ ये जुल्म हुआ है

भूखा वो सोया बात नयी नहीं उसकी
एक आदमी के साथ तो ये पहले भी हुआ है

कमलेश दुबे