कैसी ये शहर में अब बहारें है
हर तरफ़ रंजीशैं, नफरत व तलवारें है।
सड़क पर मौत राह देखती है
पर यहाँ फुटपाथ भी कहाँ हमारे है।
चाहकर भी जो साथ ना छोड़े,
गम ही कुछ ऐसे यहाँ हमारे हैं।
वो जरुर सुनेगा रोटियों की बातें,
उसने फाकों में दिन गुजारें हैं।
उनसे अदब से पेश मत आओ
वो ही पक्के दुश्मन यहाँ हमारे हैं।
कमलेश दुबे
