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रविवार, 3 अक्टूबर 2010

क्यों रहती हो, चुपचाप सी यूँ खोई हुई सी

04 /10 /2010 
 
क्यों रहती हो,
चुपचाप सी 
यूँ खोई हुई सी 
दुनिया से अलहेदा-अलहेदा 
क्यों रहती हो 
क्या दिल को आजकल कोई 
चाले लग गए हैं 
जो ये मानता नहीं है 
कोई मश्वरा..!   क्यों रहती हो,
 
मैं ये देख रहा हूँ
जो चाँद शाम से
इस हसीं आसमान पर
डाल देता डेरा
वो चाँद आजकल
देर रात मैं 
कभी तो निकलता है 
कभी नहीं भी निकलता 
निगाहों में पहले सी 
शरारत नहीं है 
चेहरे का रंग भी 
है उड़ा उड़ा 
हम, कुछ भी समझ 
नहीं  पा रहे है 
कैसे कर दें आपकी दिल बगिया हरा...!  क्यों रहती हो,
 
कौन सी बात है जिसने 
शांत समंदर में 
हलचल मचा दी 
तमाम ख्वहिसे गहरी
नींद में सोई थी 
की किसने उन्हें उल्फत की
राहें  बता दी
अब दिल थामे ना थमे
एक जगह खड़ा ना रहे, और
हमेशा किसी बात पर रहता अड़ा..!   क्यों रहती हो,
कमलेश दुबे