तू जग हसाई क्यों करे
तू जग हसाई क्यों करे
खनखनाते सिक्के को तू
पाई-पाई क्यों करे
ले के आ रही थी
जो तेरे आँगन
बरखा की बुँदे
खुशियों की संदूके
तुने रास्ते में रोककर
खुद अपनी इस तिजोरी पर डाल दिया डाका
कितना तू अभागा
अरे खिलने से पहले ही कलि की
तू ऐसे कटाई क्यों करे !
खेत ना तैयार था
तू बीज बोने अड़ गया
फल नहीं मन का मिला
तू तोड़ने पे अड़ गया
सोच भूमि की दसा को
सोच फल की मनोदशा को
जो, मृत्यु से पहले किसी के
हाथ में हसिया धरा हो
ज्वार मक्का गेहूं बाली
खिलने दे तू धान डाली
महकने दे खेत में तू
आये जो सरसों निराली
वक्त से पहले कभी तू
इनकी कटाई ना करें
कमलेश दुबे
