कहते हो कोई है नहीं सारे शहर में बात,
फिर बे वजह उठाए हैं क्यों लोगो ने अपने हाथ!
सुना था मैंने की कल वो पा जाएगा सजा,
लेकिन वो केसे हो गया अजीज रातों रात !
माना की घर में है, तुम्हारे भरा अनाज,
पर थोड़ा उन्हें दे दो जो बाहर फैला रहे हैं हाथ!
दो चार पल को माना हो गए थे हम अलग
लेकिन पहले की तरह अब चल रहे हे साथ!
अभी तो मारने को वो एक दूजे को हैं उतारू
कुछ देर बाद देखना वो मिलाएँगे अपने हाथ !
मानों किसे भी तुम यहाँ सजदा किसे भी करो
लेकिन दुआ में तो सभी के उठते हैं उपर हाथ!
कमलेश दुबे
