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रविवार, 23 अगस्त 2009

उनसे अदब से पेश मत आओ

कैसी ये शहर में अब बहारें है
हर तरफ़ रंजीशैं, नफरत तलवारें है

सड़क पर मौत राह देखती है
पर यहाँ फुटपाथ भी कहाँ हमारे है

चाहकर भी जो साथ ना छोड़े,
गम ही कुछ ऐसे यहाँ हमारे हैं

वो जरुर सुनेगा रोटियों की बातें,
उसने फाकों में दिन गुजारें हैं

उनसे अदब से पेश मत आओ
वो ही पक्के दुश्मन यहाँ हमारे हैं

कमलेश दुबे

मिटटी का बिछोना है

पत्थर का सिरहाना है, मिटटी का बिछोना है
आराम से इस तरह का ये उसका सोना है

एक बशर जो चौराहे पर चिल्ला रहा था आज
सबको पता हे कल उसका क्या होना है

जागते में तो सभी हम, कुछ भी यहाँ चिल्लाये
पर नींद आख़िर सबको एक सी ही सोना है

अच्छा है सबने हाथों में उठा ली है शमशीरे
यह भी बता दो नफरत का कब इनसे कत्ल करना है