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शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

जादू हबीब जी का

देर तक कायम रहने वाला नशा

यूँ तो नाटक हमेशा से ही मुझे आकर्षित करते है ! जब-जब भारत भवन भोपाल में नाटक होता है में देखता हूँ पिछले दिनों १२ दिनों के रंग आधार नाट्य समारोह का समापन 0७/०४/२०१० को "चरणदास चोर" से हुआ हबीब तनवीर जी के इस नाटक की खास बात यह है पूरे भारत में जहाँ जहाँ भी इसका मंचन होता है, दर्शक खींचे चले आते है लोगों को मंत्र मुग्ध करने वाला ये नाटक चुम्बक की नाई अपनी और खींचता है इस नाटक की प्रतिष्ठा किसी से छुपी नहीं है कमोबेश हमेशा की तरह इस बार भी शाम ५ बजे से भारत भवन ने लोगों को अपनी और खीचना शुरू कर दिया था आम तोर पर टिकिट लेने से गुरेज करने वाले लोगों ने भी टिकिट लेकर इस नाटक को देखते है.  ७ तारीख को   भारत भवन के अन्तरंग हाल में जितने लोग थे उससे ज्यादा लोग बाहर प्रोजेक्टर पर नाटक का आन्नद ले रहे थे.

भांग को न पीने वाले लोग, जेसे होली के शुभ अवसर पर इसका सेवन कर लेते है वेसे ही नाटक को न देखने वाले लोग इस नाटक के प्रदर्शन की सुनकर इसका रसास्वादन करने चले आते है जितनी बार ये नाटक भारत भवन में हुआ है लोगों का हुजूम चला आता है लोगों के साथ -साथ  मेरी मंशा भी सबसे आगे की कतार में बैठकर नाटक देखने की होती है अक्सर दुसरे प्रदर्शनों में लोगों का ध्यान नाटक की वेशभूषा, अभिनय, प्रकाश परिकल्पना,  और नाटक से जुड़ी दूसरी बातों पर भी जाता है, पर इस नाटक में दर्शक ऐसा खो जाता है की उसका ध्यान इस और जाता ही नही है छतीसगढ़ के गांवों के कलाकार जब एक साथ अपना जादू बिखरते है तो आदमी अपनी सुध-बुध खो देता है कभी कभी यूँ  लगता है  नाटक के सारे कलाकार दर्शकों को किसी जादूगर की भांति  अपने सम्मोहन से जकड लेते है. इस नाटक को देखते वक्त दर्शक एक दूसरी ही दुनिया में चला जाता है. 
कुल मिलाकर हबीब जी की "चरणदास चोर" नाम की ये  दारू की बोतल जब-जब खुलती है तब-तब सारे लोग  दुनिया की परवाह किये बिना उसे पीने चले आते है और उसे पीने के बाद कई दिनों तक उसके नशे में डूबे रहते है   में यही दुआ करता हूँ की हमारे प्यालों कभी रीते नहीं .
 
जैसा मुझे समझ आया 
कमलेश दुबे  
सुपडे में फटकती है खुशियों को
गम चालने में छान देती है
बेटियां घर के भले के लिए
आगे बढ़ के ध्यान देती है

मंगलवार, 6 अप्रैल 2010

तभी सर पे उठाए

बांसुरी की तान छेड़े दिल कभी
और कभी ये घुंघरूओ सा छन छनाए
जब कभी भी हो हमें दीदार तेरा
दिल, सारी दुनिया  को तभी सर पे उठाए 

पाई-पाई क्यों करे

तू जग हसाई क्यों करे
तू जग हसाई क्यों करे
खनखनाते सिक्के को तू
पाई-पाई क्यों करे

ले के आ रही थी
जो तेरे आँगन
बरखा की बुँदे
खुशियों की संदूके
तुने रास्ते में रोककर
खुद अपनी इस तिजोरी पर  डाल  दिया डाका
कितना तू अभागा
अरे खिलने से पहले ही कलि की

मैं क्यों अकेला खड़ा हूँ!

इस बात को लेकर में यहाँ खुद से लड़ा हूँ,
ये भीड़ है फिर भी मैं  क्यों अकेला खड़ा हूँ!

एक वक्त था उनके कदम उठते थे मेरे साथ,
आज मुझको देखो साथ उनके चलने को खड़ा हूँ!

निकलेगा कोई मेरी भी बात सुनने वाला,
ये आरजू लिये में वहां कबसे खड़ा हूँ !

कई बार दर पे जाकर मेनें उसको भी मनाया,
तब कहीं जाकर में अपने पावों पे खड़ा हूँ !

रविवार, 4 अप्रैल 2010

रोज रोज ही ये होता है !

सूरज जाकर कही सोता है
रोज रोज ही ये होता है !

बाजारों में वाही चले अब
सिक्का जो सबसे खोटा है!

 तलवारें खंजर की खेती
आदमी नफरत क्यों बोता है!

कभी किसी से नहीं सुना ये,
मेरा कद तुझसे छोटा है!

रटा रटाया ही बोलेगा,
पाला हुआ जो तोता है!

कमलेश दुबे

दोहे

अपने तन से सेंकिए, ठण्ड में दोनों हाथ,
सबको ही देती  नहीं लकड़ी अपनी आंच!
हाथों से जब दिन फिसला और आई काली  रात,
नील गगन से करने लगे तारे जाकर बात!
आकर के मोला मेरे मन की उलझन खोल,
जीवन सबका एक सा क्यों अलग-अलग हे मोल!
अपने घर न धुप है और ना ही है छाँव,
फिर भी बाहर जाते हैं क्यों चादर से ये पाँव !
खोल यहाँ  तू  देख ले कोई भी तू किताब,
सब में लिखा है एक सा अच्छे बुरे का हिसाब!
हंस हंस के पर्वत करें मानव का उपहास,
आधे पत्थर मंदिर में आधे मस्जिद के पास!
आँखों को आंसू दिए, और जीवन को साँस,
रोटी से यहाँ भूख मिटे, और पानी से प्यास!
सदियों से ये वक्त युही खड़ा हुआ हैं मोन,
जल्दी जल्दी तारीखें ये बदल रहा है कोन!
देख रहा हूँ सड़क का कितना अच्छा है नसीब ,
मंदिर और मस्जिद के ये ही हर पल रहे करीब!
नदिया के इस पर मैं, और तुम हो उस पार,
लहरों पर ही पल रहा मेरा तुम्हारा प्यार!

कमलेश दुबे