इस बात को लेकर में यहाँ खुद से लड़ा हूँ,
ये भीड़ है फिर भी मैं क्यों अकेला खड़ा हूँ!
एक वक्त था उनके कदम उठते थे मेरे साथ,
आज मुझको देखो साथ उनके चलने को खड़ा हूँ!
निकलेगा कोई मेरी भी बात सुनने वाला,
ये आरजू लिये में वहां कबसे खड़ा हूँ !
कई बार दर पे जाकर मेनें उसको भी मनाया,
तब कहीं जाकर में अपने पावों पे खड़ा हूँ !
मंगलवार, 6 अप्रैल 2010
रविवार, 4 अप्रैल 2010
रोज रोज ही ये होता है !
सूरज जाकर कही सोता है
रोज रोज ही ये होता है !
बाजारों में वाही चले अब
सिक्का जो सबसे खोटा है!
तलवारें खंजर की खेती
आदमी नफरत क्यों बोता है!
कभी किसी से नहीं सुना ये,
मेरा कद तुझसे छोटा है!
रटा रटाया ही बोलेगा,
पाला हुआ जो तोता है!
कमलेश दुबे
रोज रोज ही ये होता है !
बाजारों में वाही चले अब
सिक्का जो सबसे खोटा है!
तलवारें खंजर की खेती
आदमी नफरत क्यों बोता है!
कभी किसी से नहीं सुना ये,
मेरा कद तुझसे छोटा है!
रटा रटाया ही बोलेगा,
पाला हुआ जो तोता है!
कमलेश दुबे
दोहे
अपने तन से सेंकिए, ठण्ड में दोनों हाथ,
सबको ही देती नहीं लकड़ी अपनी आंच!
हाथों से जब दिन फिसला और आई काली रात,
नील गगन से करने लगे तारे जाकर बात!
आकर के मोला मेरे मन की उलझन खोल,
जीवन सबका एक सा क्यों अलग-अलग हे मोल!
अपने घर न धुप है और ना ही है छाँव,
फिर भी बाहर जाते हैं क्यों चादर से ये पाँव !
खोल यहाँ तू देख ले कोई भी तू किताब,
सब में लिखा है एक सा अच्छे बुरे का हिसाब!
हंस हंस के पर्वत करें मानव का उपहास,
आधे पत्थर मंदिर में आधे मस्जिद के पास!
आँखों को आंसू दिए, और जीवन को साँस,
रोटी से यहाँ भूख मिटे, और पानी से प्यास!
सदियों से ये वक्त युही खड़ा हुआ हैं मोन,
जल्दी जल्दी तारीखें ये बदल रहा है कोन!
देख रहा हूँ सड़क का कितना अच्छा है नसीब ,
मंदिर और मस्जिद के ये ही हर पल रहे करीब!
नदिया के इस पर मैं, और तुम हो उस पार,
लहरों पर ही पल रहा मेरा तुम्हारा प्यार!
कमलेश दुबे
सबको ही देती नहीं लकड़ी अपनी आंच!
हाथों से जब दिन फिसला और आई काली रात,
नील गगन से करने लगे तारे जाकर बात!
आकर के मोला मेरे मन की उलझन खोल,
जीवन सबका एक सा क्यों अलग-अलग हे मोल!
अपने घर न धुप है और ना ही है छाँव,
फिर भी बाहर जाते हैं क्यों चादर से ये पाँव !
खोल यहाँ तू देख ले कोई भी तू किताब,
सब में लिखा है एक सा अच्छे बुरे का हिसाब!
हंस हंस के पर्वत करें मानव का उपहास,
आधे पत्थर मंदिर में आधे मस्जिद के पास!
आँखों को आंसू दिए, और जीवन को साँस,
रोटी से यहाँ भूख मिटे, और पानी से प्यास!
सदियों से ये वक्त युही खड़ा हुआ हैं मोन,
जल्दी जल्दी तारीखें ये बदल रहा है कोन!
देख रहा हूँ सड़क का कितना अच्छा है नसीब ,
मंदिर और मस्जिद के ये ही हर पल रहे करीब!
नदिया के इस पर मैं, और तुम हो उस पार,
लहरों पर ही पल रहा मेरा तुम्हारा प्यार!
कमलेश दुबे
चाँद पे जा के चाँद लिखो
अपनी कहानी आप लिखो,
चाँद पे जा के चाँद लिखो
वो देख तुम्हे हँस दे तो फिर तुम,
आगे की कुछ बात लिखो
कमलेश दुबे
चाँद पे जा के चाँद लिखो
वो देख तुम्हे हँस दे तो फिर तुम,
आगे की कुछ बात लिखो
कमलेश दुबे
अजीज रातों रात !
कहते हो कोई है नहीं सारे शहर में बात,
फिर बे वजह उठाए हैं क्यों लोगो ने अपने हाथ!
सुना था मैंने की कल वो पा जाएगा सजा,
लेकिन वो केसे हो गया अजीज रातों रात !
माना की घर में है, तुम्हारे भरा अनाज,
पर थोड़ा उन्हें दे दो जो बाहर फैला रहे हैं हाथ!
दो चार पल को माना हो गए थे हम अलग
लेकिन पहले की तरह अब चल रहे हे साथ!
अभी तो मारने को वो एक दूजे को हैं उतारू
कुछ देर बाद देखना वो मिलाएँगे अपने हाथ !
मानों किसे भी तुम यहाँ सजदा किसे भी करो
लेकिन दुआ में तो सभी के उठते हैं उपर हाथ!
कमलेश दुबे
फिर बे वजह उठाए हैं क्यों लोगो ने अपने हाथ!
सुना था मैंने की कल वो पा जाएगा सजा,
लेकिन वो केसे हो गया अजीज रातों रात !
माना की घर में है, तुम्हारे भरा अनाज,
पर थोड़ा उन्हें दे दो जो बाहर फैला रहे हैं हाथ!
दो चार पल को माना हो गए थे हम अलग
लेकिन पहले की तरह अब चल रहे हे साथ!
अभी तो मारने को वो एक दूजे को हैं उतारू
कुछ देर बाद देखना वो मिलाएँगे अपने हाथ !
मानों किसे भी तुम यहाँ सजदा किसे भी करो
लेकिन दुआ में तो सभी के उठते हैं उपर हाथ!
कमलेश दुबे
बुधवार, 31 मार्च 2010
मेरे घर का धुआं हे
तुमको जो काले बादल वहां दिखाई देते हैं
है नहीं कुछ और मेरे घर का धुँआ हैं
उंगलियो को आंच लगती नहीं है आज
शायद नमी का लकड़ियों से कुछ समझोता हुआ हैं
हैं नहीं निशा किसी हादसे के ये
शराफत से जीने का यहाँ ये जुल्म हुआ है
भूखा वो सोया बात नयी नहीं उसकी
एक आदमी के साथ तो ये पहले भी हुआ है
कमलेश दुबे
है नहीं कुछ और मेरे घर का धुँआ हैं
उंगलियो को आंच लगती नहीं है आज
शायद नमी का लकड़ियों से कुछ समझोता हुआ हैं
हैं नहीं निशा किसी हादसे के ये
शराफत से जीने का यहाँ ये जुल्म हुआ है
भूखा वो सोया बात नयी नहीं उसकी
एक आदमी के साथ तो ये पहले भी हुआ है
कमलेश दुबे
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